पाकिस्तान ने वो कर दिखाया जो किसी ने सोचा भी नहीं था — इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को आधिकारिक रूप से "आतंकवादी" घोषित कर दिया। ये सिर्फ़ बयानबाज़ी नहीं — ये एक सरकारी डिज़िग्नेशन है। पाकिस्तान की सरकार ने नेतन्याहू को उसी कैटेगरी में रख दिया जिसमें दुनिया आतंकी संगठनों के सरगनाओं को रखती है। ये क़दम लेबनान पर इज़रायल के हमलों के बाद आया — जब 8 अप्रैल को इज़रायली एयरस्ट्राइक्स ने दक्षिणी लेबनान में हिज़बुल्लाह के ठिकानों को तबाह किया, लेकिन साथ में नागरिक भी मारे गए।
पाकिस्तान की ये हरकत कई स्तरों पर हैरान करने वाली है। पहला — पाकिस्तान और इज़रायल के बीच कभी राजनयिक संबंध नहीं रहे, लेकिन एक ख़ामोश "नॉन-एंगेजमेंट" पॉलिसी थी। वो अब तार-तार हो गई। दूसरा — पाकिस्तान ख़ुद इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता की मेज़बानी कर रहा है। किसी भी मध्यस्थ से ये उम्मीद की जाती है कि वो सभी पक्षों के साथ संतुलित रहे — लेकिन जब मध्यस्थ ही एक पक्ष के नेता को "आतंकवादी" कहने लगे, तो वार्ता की विश्वसनीयता कहाँ रहती है?
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया मिश्रित रही। कुछ मुस्लिम-बहुल देशों ने ख़ामोशी से समर्थन जताया, जबकि पश्चिमी देशों ने इसे "भड़काऊ और ग़ैर-ज़िम्मेदाराना" बताया। अमेरिका ने अभी सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी — लेकिन वॉशिंगटन में ये बेचैनी ज़रूर है कि पाकिस्तान की वार्ता की भूमिका अब कितनी कारगर रहेगी। असल में ये पाकिस्तान की घरेलू राजनीति का अंतरराष्ट्रीय मंच पर ड्रामा है — इस्लामी दुनिया में अपनी छवि चमकाने की कोशिश जो बैकफ़ायर कर रही है। नेतन्याहू को "आतंकवादी" कहना आसान है — लेकिन इसकी कूटनीतिक क़ीमत पाकिस्तान भुगतेगा, वो भी ब्याज समेत।