जब पश्चिम एशिया में बम बरस रहे हों, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ फँसे हों, और दुनिया की ऊर्जा सप्लाई चेन हिल रही हो — तब भारत क्या कर रहा है? डील कर रहा है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर मॉरीशस में 9वें हिंद महासागर सम्मेलन में पहुँचे और वहाँ प्रधानमंत्री नवीन रामगूलम से मिलकर भारत-मॉरीशस के बीच तेल और गैस आपूर्ति का सरकार-से-सरकार समझौता फ़ाइनल कर दिया। ये कोई साधारण व्यापार नहीं — ये हिंद महासागर में भारत की ऊर्जा कूटनीति का नया अध्याय है।
जयशंकर ने साफ़ कहा — पश्चिम एशिया का संकट दिखा रहा है कि ग्लोबल एनर्जी पर निर्भरता कितनी नाज़ुक है। होर्मुज़ स्ट्रेट के पास शिपिंग ठप है, क्रूड ऑयल की क़ीमतें उछल रही हैं, और छोटे द्वीपीय देश जैसे मॉरीशस सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में भारत ने कदम बढ़ाया। ये डील सिर्फ़ तेल-गैस की नहीं — ये भारत के हिंद महासागर क्षेत्र में "नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर" बनने के विज़न का हिस्सा है। जब चीन इस इलाक़े में बंदरगाह बना रहा है और श्रीलंका से लेकर मालदीव तक अपना जाल फैला रहा है — तब भारत को ऐसी ठोस कूटनीतिक चालें चलनी ही होंगी।
इस सम्मेलन का विषय है "हिंद महासागर गवर्नेंस के लिए सामूहिक ज़िम्मेदारी" — और भारत दिखा रहा है कि ज़िम्मेदारी सिर्फ़ भाषणों में नहीं, ज़मीन पर भी निभाई जा सकती है। पिछले एक साल में भारत-मॉरीशस के रिश्ते "एन्हांस्ड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप" तक पहुँच चुके हैं। रक्षा अटैची की नियुक्ति और विकासात्मक सहायता भी बढ़ाई गई है। सवाल ये नहीं कि भारत ये क्यों कर रहा है — सवाल ये है कि अगर भारत ये नहीं करता, तो कौन करता? चीन। और वो जवाब किसी को पसंद नहीं आना चाहिए। जयशंकर की ये चाल शतरंज की बिसात पर एक शानदार घोड़ा है — ख़ामोश, लेकिन घातक।