जब दो पड़ोसी देशों के बीच सीमाएँ दीवारों से ज़्यादा मज़बूत हों, तो श्रद्धा ही वो ताक़त है जो दरवाज़े खोलती है। आज 2,800 से अधिक भारतीय सिख यात्री पाकिस्तान की धरती पर बैसाखी का पवित्र त्योहार मनाने पहुँच रहे हैं। पाकिस्तान के हाई कमीशन ने नई दिल्ली में ये वीज़ा जारी किए हैं — 1974 के द्विपक्षीय धार्मिक स्थल यात्रा प्रोटोकॉल के तहत। ये वो प्रोटोकॉल है जो सारी राजनीतिक तनातनी के बावजूद आस्था की डोर को कभी टूटने नहीं देता। गुरुद्वारा पंजा साहिब हसन अब्दल, गुरुद्वारा ननकाना साहिब और गुरुद्वारा करतारपुर साहिब — ये वो तीन पवित्र स्थल हैं जहाँ भारतीय श्रद्धालु 19 अप्रैल तक ठहरेंगे।
बैसाखी सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है — ये सिख इतिहास की रीढ़ है। 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने इसी दिन ख़ालसा पंथ की स्थापना की थी। पंजाब में ये फ़सल कटाई का उत्सव भी है — भांगड़ा, मेले, और कृषि का धन्यवाद। 14 अप्रैल को पंजाब में वैसाखी राज्य अवकाश है और हर गाँव, हर शहर में जश्न होगा। लेकिन जो यात्री पाकिस्तान जा रहे हैं, उनके लिए ये सिर्फ़ धार्मिक यात्रा नहीं — ये भावनात्मक यात्रा है। विभाजन के दर्द को सहने वाले परिवारों की संतानें उस ज़मीन पर जा रही हैं जहाँ उनके पूर्वजों ने जन्म लिया, जहाँ गुरुओं ने चरण रखे।
इस यात्रा का समय भी दिलचस्प है। पाकिस्तान इन दिनों अमेरिका-ईरान शांति वार्ता का मेज़बान है और अपनी कूटनीतिक भूमिका को चमका रहा है। भारत के साथ भी ये एक सकारात्मक संकेत है — भले ही दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्ते अभी भी ठंडे हैं, लेकिन धार्मिक पर्यटन का ये सिलसिला जनता-से-जनता संपर्क का सबसे भरोसेमंद माध्यम बना हुआ है। 2,800 वीज़ा एक संख्या भर नहीं — ये 2,800 कहानियाँ हैं, 2,800 सपने हैं जो आज सरहद पार करके सच हो रहे हैं। जब राजनेता दीवारें खड़ी करते हैं, तो श्रद्धा सुरंग खोद लेती है।