कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को तेलंगाना हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शुक्रवार को कोर्ट ने उन्हें एक हफ़्ते की ट्रांज़िट अग्रिम ज़मानत दे दी। ये ज़मानत असम पुलिस द्वारा दर्ज FIR के संबंध में है, जो असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा की पत्नी रिणिकी भूयान की शिकायत पर दर्ज हुई थी। खेड़ा ने 5 अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आरोप लगाया था कि CM शर्मा की पत्नी के पास कई पासपोर्ट और विदेशों में छिपी संपत्ति है। इसके बाद असम पुलिस ने मानहानि, जालसाज़ी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी गंभीर धाराओं में FIR दर्ज कर दी।
7 अप्रैल को असम पुलिस ने दिल्ली में खेड़ा के आवास पर तलाशी ली — एक राजनीतिक कार्रवाई जिसने कांग्रेस को भड़का दिया। सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने खेड़ा की तरफ़ से दलील दी कि FIR में "हर संभव धारा" लगाई गई है ताकि राजनीतिक दबाव बनाया जा सके। उनका कहना था कि अगर आरोप ग़लत भी साबित हों, तो ये मामला मानहानि का है — गिरफ़्तारी का कोई आधार नहीं बनता। कांग्रेस के गौरव गोगोई ने कहा कि ये "राजनीतिक शिकार" है और BJP शासित राज्य की पुलिस का इस्तेमाल विपक्ष को दबाने के लिए किया जा रहा है।
तेलंगाना HC ने एक हफ़्ते की अंतरिम सुरक्षा दी है और खेड़ा को निर्देश दिया है कि वो संबंधित न्यायालय से आगे की क़ानूनी राहत लें। लेकिन असली मुद्दा ये है — क्या विपक्षी नेताओं पर FIR दर्ज करना लोकतंत्र में सामान्य है? असम से लेकर तेलंगाना तक, तीन राज्यों में पुलिस कार्रवाई — ये दिखाता है कि भारतीय राजनीति में विपक्ष पर दबाव बनाने के लिए क़ानूनी मशीनरी का इस्तेमाल कितना आम हो गया है। खेड़ा को अभी एक हफ़्ते की राहत मिली है, लेकिन असली लड़ाई अभी शुरू हुई है।