भारतीय लोकतंत्र ने कल एक बार फिर अपनी ताक़त दिखा दी। असम, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों का मतदान हुआ और जो आँकड़े आए, वो किसी ज़लज़ले से कम नहीं हैं। पुडुचेरी ने तो इतिहास ही रच दिया — 89.87% मतदान, जो 1964 में पहले विधानसभा चुनाव के बाद का सर्वोच्च आँकड़ा है। असम में 85.38% वोटिंग हुई, जो 2021 के 82.04% को पीछे छोड़ गई। केरल में भी 77-78% के बीच मतदान दर्ज हुआ, जो पिछली बार के 74.06% से काफ़ी ऊपर है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इसे "सामान्य नहीं, ऐतिहासिक" बताया — और इस बार वो ग़लत नहीं हैं।
296 सीटों पर 1,906 उम्मीदवारों की किस्मत EVM में बंद हो चुकी है। असम की 126 सीटों पर BJP तीसरी बार सत्ता का सपना देख रही है — कुछ जो भारतीय राजनीति में दुर्लभ है। कांग्रेस वापसी की उम्मीद में है, लेकिन क्या राहुल गांधी का "असम फ़ॉर्मूला" काम करेगा? केरल की 140 सीटों पर LDF और UDF के बीच वही पुरानी जंग है — केरल की परंपरा रही है कि हर बार सत्ता बदलती है, लेकिन पिनराई विजयन ने 2021 में वो परंपरा तोड़ दी थी। क्या इस बार UDF बदला लेगा? पुडुचेरी की 30 सीटों पर NDA और INDIA गठबंधन आमने-सामने हैं।
लेकिन असली कहानी इन नंबरों के पीछे है। इतनी भारी संख्या में लोग वोट देने क्यों निकले? क्या ये सत्ता के खिलाफ़ गुस्सा है, या सत्ता के समर्थन में लहर? राजनीतिक पंडित दोनों तरफ़ दाँव लगा रहे हैं। तमिलनाडु में 23 अप्रैल को और पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा। सभी पाँच राज्यों के नतीजे आएँगे। ये चुनाव मोदी सरकार की राज्य स्तर पर परीक्षा है — और जनता ने पर्चा भर दिया है, अब बस नतीजों का इंतज़ार है।