मध्य पूर्व में तनाव का नया अध्याय शुरू हो गया है। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गुरुवार को एक टेलीविज़्ड संबोधन में घोषणा की कि उन्होंने अपनी कैबिनेट को लेबनान के साथ "जल्द से जल्द" सीधी बातचीत शुरू करने का निर्देश दिया है। अमेरिकी विदेश विभाग ने पुष्टि की है कि अगले हफ़्ते वाशिंगटन में वार्ता की मेज़बानी की जाएगी। लेकिन सवाल ये है — जब बम गिर रहे हों तो बातचीत की क्या अहमियत? बुधवार को इज़रायली सेना ने बेरूत में अब तक का सबसे बड़ा हमला किया — 10 मिनट में 100 ठिकानों पर बमबारी, जिसमें हिज़बुल्लाह के एक नेता का भतीजा भी मारा गया। एक ही दिन में 300 से ज़्यादा लोग मारे गए और 1,150 से ज़्यादा घायल हुए।
हिज़बुल्लाह के सांसद अली फ़य्याद ने साफ़ कह दिया है कि इज़रायल से सीधी बातचीत नामंज़ूर है। उनकी माँग है कि पहले पूर्ण सीज़फ़ायर हो, उसके बाद ही कोई बात होगी। लेबनान सरकार ने भी यही रुख अपनाया है — बिना सीज़फ़ायर कोई बातचीत नहीं। लेबनानी प्रधानमंत्री नवाफ़ सलाम जल्द वाशिंगटन जाएंगे, लेकिन क्या अमेरिका इज़रायल पर दबाव बना पाएगा? ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका-ईरान सीज़फ़ायर को बचाए रखने में तो कामयाबी पाई है, लेकिन लेबनान को उसमें शामिल करने पर गंभीर मतभेद बने हुए हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि नेतन्याहू की असली मंशा हिज़बुल्लाह को निशस्त्र करना है, शांति स्थापित करना नहीं। बमबारी जारी रखते हुए बातचीत का नाटक करना — ये पुरानी इज़रायली रणनीति है। 30 लाख से ज़्यादा ईरानी और 10 लाख लेबनानी विस्थापित हो चुके हैं, 600 से ज़्यादा जहाज़ खाड़ी क्षेत्र में फंसे हुए हैं। ये संकट सिर्फ़ मध्य पूर्व का नहीं, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का है। सवाल सीधा है — क्या बम और बातचीत एक साथ चल सकते हैं? इतिहास कहता है, नहीं।