जब दुनिया की नज़रें अमेरिका-ईरान सीज़फ़ायर पर टिकी हैं, किम जोंग उन ने मौक़े का फ़ायदा उठाया। उत्तर कोरिया ने 6 अप्रैल से तीन दिनों में ऐसा हथियार प्रदर्शन किया जो हाल के महीनों में सबसे व्यापक है — क्लस्टर बम से लैस बैलिस्टिक मिसाइलें, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियार प्रणालियाँ, और कार्बन-फ़ाइबर बम। ये मिसाइलें प्योंगयांग के पास से दागी गईं और 240 से 700 किलोमीटर तक उड़ने के बाद समुद्र में गिरीं। दक्षिण कोरिया की सेना ने कम से कम एक प्रक्षेपण की पुष्टि की है।
सबसे ख़तरनाक बात ये है कि क्लस्टर बम वॉरहेड परमाणु-सक्षम ह्वासॉन्ग-11 मिसाइलों पर लगाए गए हैं — ये रूस की इस्कंदर मिसाइल की नक़ल हैं और कम ऊँचाई पर उड़कर मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम को चकमा देने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। उत्तर कोरिया का दावा है कि ये मिसाइलें "6.5 से 7 हेक्टेयर क्षेत्र को सबसे तीव्र शक्ति के साथ राख कर सकती हैं।" ये सिर्फ़ शब्द नहीं, ये एक सीधी धमकी है — दक्षिण कोरिया के शहरों, सैन्य ठिकानों और बुनियादी ढाँचे को। क्लस्टर बम 2008 की अंतर्राष्ट्रीय संधि के तहत प्रतिबंधित हैं, लेकिन उत्तर कोरिया, अमेरिका और दक्षिण कोरिया — तीनों ने वो संधि साइन नहीं की है।
ह्वासॉन्ग-11 का डिज़ाइन रूस के इस्कंदर पर आधारित है, जो उत्तर कोरिया-रूस सैन्य तकनीक साझेदारी को उजागर करता है। ये टेस्ट ऐसे समय में हो रहे हैं जब वैश्विक ध्यान मध्य पूर्व पर केंद्रित है — किम को पता है कि जब बड़े खिलाड़ी आपस में उलझे हों, तो छोटे खिलाड़ी अपना खेल खेल सकते हैं। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियार और कार्बन-फ़ाइबर बम — ये दोनों बिजली ग्रिड और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को तबाह करने के लिए बने हैं। मतलब साफ़ है — उत्तर कोरिया सिर्फ़ परमाणु धमकी नहीं, बल्कि पारंपरिक युद्ध में भी विविध और घातक क्षमताएँ बना रहा है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तनाव का एक और अध्याय शुरू हो गया है।