छह हफ़्ते की तबाही के बाद, अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को दो हफ़्ते का सीज़फ़ायर हुआ — मध्यस्थता की? पाकिस्तान ने। हाँ, वही पाकिस्तान जिसे दुनिया "असफल राज्य" कहती है, उसने वो काम कर दिखाया जो भारत जैसी आर्थिक महाशक्ति नहीं कर पाई। आज 10-11 अप्रैल को इस्लामाबाद में शांति वार्ता शुरू हो रही है — अमेरिका की तरफ़ से उपराष्ट्रपति JD Vance और ईरान की तरफ़ से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाक़ेर ग़ालीबाफ़ और विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची मौजूद हैं। मेज़ पर दोनों तरफ़ बड़े नाम हैं — लेकिन भारत का नाम कहीं नहीं है।
लेकिन ये सीज़फ़ायर पहले ही डगमगा रहा है। ईरान ने आरोप लगाया कि इज़राइल और अमेरिका ने लेबनान में हमले करके सीज़फ़ायर का उल्लंघन किया। ईरान ने अस्थायी सीज़फ़ायर को ख़ारिज करते हुए अपना 10 सूत्रीय प्रस्ताव पेश किया — जिसमें प्रतिबंध हटाने, पुनर्निर्माण फंड, और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का प्रोटोकॉल शामिल है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य अभी भी बंद है — और ये सीधे तौर पर वैश्विक तेल आपूर्ति और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है।
सवाल ये है — भारत कहाँ है? जो देश दुनिया का 80% से ज़्यादा कच्चा तेल आयात करता है, जिसके पास "अधिक आर्थिक वज़न और अंतरराष्ट्रीय दृश्यता" है, वो इस संकट में क्यों ग़ायब है? पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका लेकर वैश्विक मंच पर अपनी जगह बना ली, जबकि भारत चुप बैठा रहा। होर्मुज़ बंद होने से भारत के ईंधन दाम, महँगाई, और आर्थिक स्थिरता सब ख़तरे में है। ये कूटनीतिक चुप्पी भारत को बहुत भारी पड़ सकती है — क्योंकि जब मेज़ पर आपकी कुर्सी नहीं होती, तो फ़ैसले आपके बिना होते हैं।