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बंगाल में 91 लाख मतदाता हटाए गए — लोकतंत्र की सफाई या चुनावी गणित का खेल?

KYAKHABARHAI डेस्क · 07 Apr 2026, 18:06 · 2 घंटे पहले
चुनाव आयोग ने बंगाल में 12% मतदाताओं को हटाया — यह फर्जी मतदाताओं की सफाई है या वैध नागरिकों के अधिकार छीने जा रहे हैं? दोनों पक्षों को व्यावहारिक नज़रिए से समझिए।
⚡ आप पर असर
91 लाख मतदाताओं का हटना बंगाल के चुनावी गणित को पूरी तरह बदल सकता है — 50-60 सीटों पर 10,000 से कम अंतर से फैसला होता है, यह प्रक्रिया किसी भी दल के लिए निर्णायक हो सकती है।
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पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद कुल मिलाकर लगभग 91 लाख मतदाता हटाए गए हैं — यह राज्य के कुल 7.66 करोड़ मतदाताओं का लगभग 12% है। दिसंबर में प्रकाशित मसौदा सूची से 58.25 लाख मतदाता मृत, अनुपस्थित, स्थानांतरित या डुप्लीकेट के रूप में हटाए गए, फरवरी की अंतिम सूची से 5 लाख और हटे, और अब न्यायिक निर्णय प्रक्रिया में 60.06 लाख में से 27.16 लाख अयोग्य पाए गए। सबसे अधिक हटाए गए मतदाता मुर्शिदाबाद से हैं — 11 लाख में से 4.55 लाख अयोग्य पाए गए। उत्तर दिनाजपुर, मालदा, दक्षिण 24 परगना जैसे ज़िलों में भी बड़ी संख्या में नाम कटे हैं। इसके अलावा मतुआ और राजबंशी समुदायों के मतदाताओं को भी हटाए जाने की रिपोर्ट है, जो नदिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना तथा उत्तर बंगाल के 30-40 विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका रखते हैं। सवाल सीधा है: क्या यह प्रक्रिया वास्तव में फर्जी मतदाताओं को हटा रही है, या वैध नागरिक भी इसमें फँस रहे हैं?

चुनाव आयोग का तर्क मजबूत और तार्किक है। बंगाल की मतदाता सूची में वर्षों से फर्जी, डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं की शिकायतें रही हैं। एक ही व्यक्ति के कई वोटर कार्ड, काल्पनिक नाम, और मृत व्यक्तियों के नाम — ये सब चुनावी धोखाधड़ी का रास्ता खोलते हैं। SIR में बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर सत्यापन करते हैं, और जो व्यक्ति नहीं मिलता या जिसके दस्तावेज़ मेल नहीं खाते, उसका नाम हटाया जाता है। बिहार में जब SIR पहली बार लागू हुआ, वहाँ भी 65 लाख मतदाता हटाए गए थे और उसके बाद के चुनाव बूथ कैप्चरिंग और फर्जी मतदान से काफी मुक्त माने गए। तमिलनाडु में भी इसी प्रक्रिया में 74 लाख मतदाता अयोग्य पाए गए हैं। यानी यह बंगाल तक सीमित नहीं — यह एक राष्ट्रव्यापी सफाई अभियान है जिसका उद्देश्य स्वच्छ चुनाव सुनिश्चित करना है।

लेकिन व्यावहारिक चिंता यह है कि जब 12% मतदाता एक झटके में हट जाते हैं, तो चुनावी गणित पूरी तरह बदल जाता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में बंगाल की 50-60 सीटें 10,000 से कम अंतर से जीती गई थीं — ऐसी सीटों पर कुछ हज़ार मतदाताओं का हटना भी नतीजे पलट सकता है। जिन ज़िलों में सबसे अधिक नाम कटे हैं, वे TMC के गढ़ माने जाते हैं, और मतुआ-राजबंशी मतदाता जिन पर BJP और TMC दोनों की नज़र है, उनका हटना 30-40 सीटों को प्रभावित कर सकता है। चुनाव आयोग की मंशा सही हो सकती है, लेकिन प्रक्रिया की पारदर्शिता सवालों के घेरे में है — BLO के दौरे के समय अगर कोई प्रवासी मज़दूर काम पर गया हुआ है, तो उसका नाम कटना अन्याय है। सुप्रीम कोर्ट ने भी बंगाल सरकार की याचिका पर "हम इसमें जल्दबाज़ी नहीं करना चाहते" कहा है, जो दर्शाता है कि मामला जटिल है। असली सवाल यह नहीं है कि सफाई होनी चाहिए या नहीं — सफाई ज़रूरी है। असली सवाल यह है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर हटाने में पर्याप्त सुरक्षा उपाय, पूर्व सूचना, अपील का पर्याप्त अवसर और पुनः सत्यापन की व्यवस्था थी? लोकतंत्र की ताकत यह है कि हर वैध नागरिक मतदान कर सके — न एक फर्जी मतदाता वोट डाले, और न एक सच्चा नागरिक अपने अधिकार से वंचित रहे।

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