कांग्रेस छोड़ी, पार्टी बनाई — सिद्धू परिवार का "परंपरागत" कदम
सोमवार रात (6 अप्रैल 2026) को नवजोत कौर सिद्धू ने X पर घोषणा की कि उन्होंने एक नई राजनीतिक पार्टी — "भारतीय राष्ट्रवादी पार्टी" — की स्थापना की है। उन्होंने इसे "बहुप्रतीक्षित घोषणा" बताया और कहा कि यह "दैवीय हस्तक्षेप" से प्रेरित है।
कौर सिद्धू को फरवरी 2026 में कांग्रेस से निकाला गया था — कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारिंग की बार-बार आलोचना करने के बाद। इससे पहले उन्हें "CM की कुर्सी ₹500 करोड़ में मिलती है" वाले बयान पर निलंबित किया गया था।
लेकिन रुकिए — क्या यह कहानी कुछ जानी-पहचानी नहीं लगती? पार्टी बदलना, बयानबाजी, नई पार्टी बनाना... सिद्धू परिवार में यह तो लगभग पारिवारिक परंपरा बन चुकी है!
नवजोत सिंह सिद्धू: "ठोको ताली" से "ठोको पार्टी" तक का सफर
अगर राजनीतिक दल बदलने की ओलंपिक प्रतियोगिता हो, तो नवजोत सिंह सिद्धू निश्चित रूप से गोल्ड मेडलिस्ट होंगे। आइए उनके "शानदार" राजनीतिक सफर पर एक नज़र डालें:
- 2004-2014: BJP से अमृतसर लोकसभा सांसद — दो बार जीते। सब अच्छा चल रहा था, लेकिन...
- 2016: राज्यसभा सदस्य बने, फिर महज तीन महीने में इस्तीफा दे दिया — शायद कुर्सी आरामदायक नहीं थी
- 2016: "आवाज़-ए-पंजाब" मोर्चा बनाया — AAP से बातचीत हुई, AAP ने भी मना कर दिया
- 2017: कांग्रेस में शामिल हुए, अमृतसर ईस्ट से MLA बने
- 2021: पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बने — फिर 71 दिन में इस्तीफा!
- 2022: विधानसभा चुनाव AAP उम्मीदवार से हारे
- 2022: रोड रेज मामले (1988) में एक साल की सज़ा, जेल गए
- 2025-26: कांग्रेस में "निष्क्रिय" — न इधर के, न उधर के
जैसा कि सिद्धू साहब खुद कहते हैं — "अनुभव वो कंघी है जो ज़िंदगी तब देती है जब आदमी गंजा हो जाता है!" — लगता है राजनीति ने उन्हें काफी "अनुभव" दे दिया है।
शायरी तो कमाल, लेकिन नतीजे बेमिसाल... उल्टे!
सिद्धू की शायरी सुनकर दिल खुश हो जाता है। "जब तक सूरज चांद रहेगा, सिद्धू तेरा नाम रहेगा" — लेकिन सवाल यह है कि किस क्षेत्र में?
क्रिकेट कमेंट्री में उनके "ठोको ताली", "छा गए गुरु", "चक दे फट्टे नप्प दे किल्ली, रात नू जालंधर सवेरे दिल्ली" जैसे डायलॉग आज भी लोगों को हंसाते हैं। द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज में जज के रूप में उन्होंने करोड़ों लोगों का मनोरंजन किया।
लेकिन राजनीति में? वही "ठोको ताली" वाली एनर्जी — बस नतीजे उल्टे। BJP में रहे तो कांग्रेस की तारीफ, कांग्रेस में आए तो पार्टी अध्यक्ष पद से 71 दिन में इस्तीफा, और अब पत्नी ने अलग पार्टी बना ली। पाकिस्तान के सेना प्रमुख को गले लगाकर विवाद, पुलवामा पर बयान से तूफान — हर बार शायरी से स्थिति संभालने की कोशिश।
पंजाब की जनता ने क्या पाया?
अब ईमानदारी से पूछें — सिद्धू साहब ने पंजाब के लिए ठोस क्या किया?
- अमृतसर सांसद (2004-2014): 10 साल में कोई बड़ी उपलब्धि याद नहीं आती
- राज्यसभा (2016): तीन महीने — इतना कम समय तो प्रोबेशन पीरियड में भी नहीं होता
- MLA (2017-2022): ज़्यादातर समय पार्टी की अंदरूनी राजनीति में व्यस्त रहे
- पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष: 71 दिन — यह तो IPL सीज़न से भी छोटा कार्यकाल है!
अब पत्नी की पार्टी — "भारतीय राष्ट्रवादी पार्टी"
नवजोत कौर सिद्धू ने 2012 में BJP के टिकट पर अमृतसर ईस्ट से MLA का चुनाव जीता था। फिर पति के साथ 2017 में कांग्रेस में आ गईं। अब कांग्रेस से निकाले जाने के बाद अपनी पार्टी बना ली।
उनका दावा है कि यह "वाहेगुरु जी की इच्छा" से प्रेरित है और वे पंजाब को "गोल्डन स्टेट" बनाएंगी। लेकिन जब पति BJP, कांग्रेस, AAP से बातचीत और आवाज़-ए-पंजाब — सबमें हाथ आज़मा चुके हैं, तो जनता सोच रही है — अगली पार्टी कब?
असली सवाल: सिद्धू को करना क्या चाहिए?
यह सवाल शायद पूरे भारत का है — नवजोत सिंह सिद्धू के लिए सबसे सही करियर क्या होगा?
क्या उन्हें क्रिकेट कमेंट्री में वापस लौटना चाहिए, जहां उनकी "ठोको ताली" असल में काम आती थी? या रियलिटी शो जज बने रहना चाहिए, जहां उन्होंने सचमुच लोगों को खुशी दी? शायद शायरी का एल्बम निकालें — "सिद्धू की शायरी, Vol. 1: राजनीति से आज़ादी" — बेस्टसेलर बन सकता है!
या फिर — और यह सबसे दिलचस्प विकल्प है — गीतकार बन जाएं? पंजाबी म्यूज़िक इंडस्ट्री में उनकी आवाज़, उनका अंदाज़ और "चक दे फट्टे" वाला जोश... कौन जाने, अगला बड़ा पंजाबी गाना सिद्धू साहब का हो!
जैसा कि वे खुद कहते हैं — "जो गेंद नहीं फेंकता, वो छक्का कभी नहीं मार सकता।" बस सवाल यह है — गेंद किस मैदान में फेंकनी है, यह तो तय कर लें!
निष्कर्ष: हंसी तो फंसी!
सिद्धू परिवार ने भारतीय राजनीति को बहुत कुछ दिया है — हंसी, शायरी, ड्रामा और अनगिनत मीम्स। लेकिन ठोस विकास, नीतिगत उपलब्धियां और जनता की समस्याओं का समाधान? वह अभी भी "बहुप्रतीक्षित" है।
पंजाब की जनता को शायरी नहीं, समाधान चाहिए। तालियां नहीं, नतीजे चाहिए। और जब तक यह समझ नहीं आता, तब तक "ठोको ताली" बस एक कैचफ्रेज़ बना रहेगा — राजनीतिक उपलब्धि नहीं।