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सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट में बहस: "3 दिन अस्पृश्यता, चौथे दिन नहीं?" — आस्था का फ़ैसला कोर्ट करे या जनता?

KYAKHABARHAI डेस्क · 07 Apr 2026, 15:40 · 3 घंटे पहले
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई शुरू। जस्टिस नागरत्ना ने कहा — "अनुच्छेद 17 हर महीने 3 दिन लागू और 4 दिन नहीं, यह कैसे हो सकता है?" सवाल: भारत की आस्था के मामले कौन तय करेगा — अदालत, सरकार या जनता?
⚡ आप पर असर
आप पर असर: सबरीमाला फ़ैसले का असर सभी धार्मिक स्थलों पर पड़ सकता है। यह तय करेगा कि धार्मिक प्रथाओं में अदालतें कितना हस्तक्षेप कर सकती हैं — जो हर आस्तिक को प्रभावित करता है।
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सुप्रीम कोर्ट की 9 न्यायाधीशों की बेंच ने सोमवार को सबरीमाला मामले में संवैधानिक सवालों पर सुनवाई शुरू की। बेंच में एकमात्र महिला न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक तीखा सवाल उठाया जो इस पूरी बहस की जड़ को छूता है — "एक महिला के रूप में बोलते हुए, अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता निषेध) हर महीने 3 दिन लागू होगा और चौथे दिन नहीं — यह कैसे संभव है?" यह टिप्पणी तब आई जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के फ़ैसले की आलोचना की जिसमें जस्टिस चंद्रचूड़ ने 10-50 साल की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश रोकने को अनुच्छेद 17 के तहत "अस्पृश्यता" माना था। जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 17 को अस्पृश्यता के सदियों पुराने इतिहास के संदर्भ में मौलिक अधिकार बनाया गया था — और इसे मासिक धर्म से जोड़ना संवैधानिक रूप से प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंध मासिक धर्म पर नहीं बल्कि आयु वर्ग पर आधारित है, और भगवान अय्यप्पा के मंदिर की "सुई जेनेरिस" (अद्वितीय) परंपरा का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा — "जब कोई मज़ार या गुरुद्वारे में जाता है तो सिर ढकना पड़ता है, कोई यह दावा नहीं कर सकता कि यह उनकी गरिमा का उल्लंघन है।" उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक प्रथाओं की "आवश्यकता" तय करना अदालतों का काम नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत विधायिका का अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह 2018 के फ़ैसले की समीक्षा नहीं कर रही, बल्कि व्यापक संवैधानिक सवालों पर विचार कर रही है।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ आस्था और विश्वास लोगों की पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं — और यह संवेदनशीलता सम्मान की हक़दार है। सबरीमाला जैसे मामले में असली सवाल यह है: जब तक कोई प्रथा किसी को शारीरिक नुक़सान नहीं पहुँचाती, तो क्या उसका फ़ैसला अदालतों को करना चाहिए या उस समुदाय के लोगों को जो उस आस्था को जीते हैं? यह न कोर्ट-विरोधी बात है, न आस्था-विरोधी — यह एक लोकतांत्रिक सवाल है। जो भी फ़ैसला आए, उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन जब पश्चिमी नज़रिए से भारत की धार्मिक परंपराओं को "पिछड़ा" या "पितृसत्तात्मक" कहा जाता है — जैसा कि SG मेहता ने कहा, "भारत उतना पितृसत्तात्मक नहीं जितना पश्चिम समझता है" — तो यह समझना ज़रूरी है कि भारत के लिए सबसे अच्छा क्या है, यह भारत की जनता तय करेगी, न कोई बाहरी मानदंड।

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