दुनिया की दो सबसे ज़िद्दी ताक़तें आज एक टेबल पर बैठ रही हैं — और मेज़बान है पाकिस्तान। हाँ, वही पाकिस्तान जो कभी आतंकवाद के आरोपों में घिरा रहता था, आज इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता करवा रहा है। 40 दिनों की भीषण बमबारी के बाद 8 अप्रैल को जो सीज़फ़ायर हुआ, वो टिकेगा या नहीं — ये आज तय होगा। ट्रंप इसे "डील ऑफ़ द सेंचुरी" बता रहे हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि दोनों पक्षों के बीच की खाई ग्रैंड कैन्यन से भी चौड़ी है।
ईरान ने 10-सूत्रीय माँग रखी है जो सुनकर ट्रंप के कान खड़े हो जाएँ — अमेरिका से अनाक्रमण का वादा, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरानी नियंत्रण की मान्यता, सभी प्राथमिक और द्वितीयक प्रतिबंधों की समाप्ति, जमा ईरानी संपत्तियों की वापसी, अमेरिकी सैनिकों की क्षेत्रीय अड्डों से वापसी, और सबसे बड़ी बात — ईरान के परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को मान्यता। दूसरी तरफ़ ट्रंप कह रहे हैं कि ईरान का परमाणु भंडार "deal with" किया जाएगा और प्रतिबंधों में ढील टैरिफ़ के ज़रिए होगी, पूरी तरह हटाने से नहीं। ये कैसी शांति वार्ता है जहाँ दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तें पढ़कर चले आ रहे हैं?
इज़रायल ने सीज़फ़ायर का समर्थन तो किया, लेकिन लेबनान को इससे बाहर रखा है। नेतन्याहू साफ़ बोल चुके हैं — हिज़बुल्लाह के खिलाफ़ कार्रवाई जारी रहेगी। सीज़फ़ायर के घंटों भर में ही उल्लंघन की ख़बरें आ गईं — ईरान, UAE और कुवैत ने हमलों की शिकायत की। इराक़ के प्रो-ईरान गुटों ने अपना दो हफ़्ते का अलग सीज़फ़ायर घोषित किया। तेल बाज़ार अभी भी डोल रहा है — होर्मुज़ जलडमरूमध्य से शिपिंग लगभग ठप है, UBS ने S&P 500 का साल के अंत का लक्ष्य 7,700 से घटाकर 7,500 कर दिया। सवाल ये है कि क्या पाकिस्तान वो चमत्कार कर सकता है जो दशकों में कोई नहीं कर पाया? या ये सीज़फ़ायर बस एक ब्रेक है, युद्ध की अगली पारी से पहले का?