भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक और काला अध्याय लिखा गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल को राष्ट्रपति को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है — "तत्काल प्रभाव से।" ये इस्तीफ़ा तब आया जब लोकसभा और राज्यसभा में उनके ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव पेश हो चुका था। 145 लोकसभा सांसदों और 63 राज्यसभा सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। अब सवाल ये है — क्या इस्तीफ़े से जाँच रुक जाएगी? या ये न्यायिक जवाबदेही से बचने का रास्ता है?
पूरा मामला का है, जब जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में तैनात थे। उनके सरकारी आवास के आउटहाउस में आग लगी और बुझाने के बाद जली हुई नक़दी बरामद हुई। ये रक़म कितनी थी, ये आज तक स्पष्ट नहीं है। जस्टिस वर्मा ने शुरू से दावा किया कि वो उस वक़्त आवास पर मौजूद नहीं थे, नक़दी उनकी नहीं है, और उनके घर से कोई पैसा बरामद नहीं हुआ। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जाँच समिति ने मामले को गंभीर माना और उन्हें दिल्ली से इलाहाबाद ट्रांसफ़र कर दिया गया।
इस्तीफ़े के ख़त में जस्टिस वर्मा ने लिखा कि वो "गहरी पीड़ा" के साथ ये फ़ैसला ले रहे हैं, लेकिन इस्तीफ़े की वजह बताने से इनकार कर दिया। क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस्तीफ़ा देने से महाभियोग प्रक्रिया तकनीकी रूप से बेमानी हो जाती है, लेकिन CBI या अन्य एजेंसी की जाँच जारी रह सकती है। असली सवाल ये है — जब न्यायपालिका ही भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हो, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे? ये सिर्फ़ एक जज का मामला नहीं, ये पूरे सिस्टम पर सवाल है।