भारतीय सेना ने कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित को ब्रिगेडियर पद पर प्रमोट करने की मंज़ूरी दे दी है। ये वही अफ़सर हैं जिन पर 2008 के मालेगाँव बम ब्लास्ट का आरोप लगाया गया था और जो बाद में बरी हो गए। ये प्रमोशन तब आया जब आर्म्ड फ़ोर्सेज़ ट्रिब्यूनल (AFT) की प्रिंसिपल बेंच ने के आख़िर में उनकी रिटायरमेंट को रोक दिया था — उनकी सेवानिवृत्ति होनी थी। अब उनका कार्यकाल 2 साल बढ़ाकर 31 मार्च 2028 तक कर दिया गया है। कर्नल पुरोहित ने ट्रिब्यूनल में दलील दी थी कि मालेगाँव केस में लंबे मुक़दमे की वजह से उनका करियर बुरी तरह प्रभावित हुआ।
2008 मालेगाँव बम ब्लास्ट में 7 लोग मारे गए थे और 100 से ज़्यादा घायल हुए थे। कर्नल पुरोहित पर "हिंदू आतंकवाद" का लेबल लगाकर गिरफ़्तार किया गया था — NIA ने उन्हें आरोपी बनाया था। लेकिन अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। ये मामला भारतीय राजनीति में हमेशा विवादास्पद रहा है। एक पक्ष इसे "सेना के अफ़सर की बेइज़्ज़ती" कहता है, दूसरा पक्ष इसे "ज़मीनी सच्चाई को दबाने की कोशिश" बताता है। अब प्रमोशन के बाद ये बहस और तेज़ होगी।
ब्रिगेडियर रैंक भारतीय सेना में एक स्टार रैंक है — कर्नल से ऊपर, मेजर जनरल से नीचे। AFT ने जो राहत दी, उसके बाद सेना के पास प्रमोशन रोकने का कोई क़ानूनी आधार नहीं बचा था। लेकिन ये सवाल ज़रूर उठेगा — क्या सेना का ये फ़ैसला पूरी तरह मेरिट पर है, या इसमें राजनीतिक इशारे भी शामिल हैं? कर्नल पुरोहित का केस भारत में "हिंदू टेरर" बनाम "आतंकवाद के राजनीतिकरण" की बहस का केंद्र बिंदु रहा है। ये प्रमोशन इस बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में लाएगा।