दलाल स्ट्रीट पर शुक्रवार को ख़ून बहा। सेंसेक्स 1.2% गिरकर बंद हुआ और निवेशकों का सब्र टूटता दिखा। वजह? एक नहीं, कई। सबसे बड़ी — अमेरिका-ईरान सीज़फ़ायर कितना टिकेगा, इस पर किसी को भरोसा नहीं। पाकिस्तान में बातचीत चल रही है, लेकिन इज़रायल लेबनान पर बम बरसा रहा है, होर्मुज़ स्ट्रेट अभी भी आधा ब्लॉक है, और क्रूड ऑयल के दाम अनिश्चित हैं। ऐसे में विदेशी संस्थागत निवेशकों — FII — ने भारतीय बाज़ार से पैसा निकालना जारी रखा। फ़ाइनेंशियल स्टॉक्स सबसे ज़्यादा पिटे।
रुपये का हाल भी अच्छा नहीं। RBI ने बैंकों को अपनी ओवरनाइट पोज़ीशन 100 मिलियन डॉलर तक सीमित करने का आदेश दिया है — उसकी डेडलाइन शुक्रवार को ख़त्म हुई। इसका नतीजा? करेंसी मार्केट में भारी वोलैटिलिटी। हालाँकि रुपया लगातार दूसरे हफ़्ते डॉलर के मुक़ाबले मज़बूत रहा — लेकिन ये मज़बूती क्रूड ऑयल गिरने और आर्बिट्राज अनवाइंडिंग की वजह से है, फ़ंडामेंटल स्ट्रेंथ से नहीं। जब तक पश्चिम एशिया में असली शांति नहीं आती, ये तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी है।
बाज़ार विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अगले हफ़्ते की दिशा पूरी तरह से पाकिस्तान वार्ता के नतीजे पर निर्भर करेगी। अगर सीज़फ़ायर परमानेंट डील में बदलता है — तो बाज़ार उछलेगा। अगर इज़रायल ने लेबनान पर और बड़ा हमला किया — तो सेंसेक्स 2-3% और गिर सकता है। 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती पर बाज़ार बंद रहेगा — ये ब्रेक निवेशकों को सोचने का वक़्त देगा। लेकिन असली सवाल ये है — क्या भारतीय बाज़ार अपनी ग्रोथ स्टोरी को भू-राजनीतिक उथल-पुथल से बचा पाएगा? अभी के लिए, जवाब "शायद" है — और "शायद" दलाल स्ट्रीट को पसंद नहीं।