भारतीय सेना के सबसे बहादुर चेहरों में से एक — कर्नल सोनम वांगचुक — अब इस दुनिया में नहीं रहे। लेह में हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। उम्र 61 साल। "लद्दाख का शेर" कहे जाने वाले वांगचुक वो शख़्स थे जिन्होंने कारगिल युद्ध में भारत को पहली बड़ी सामरिक जीत दिलाई। जब पूरा देश दुश्मन की घुसपैठ से स्तब्ध था, तब मेजर सोनम वांगचुक ने चोरबत ला पर — 5,000 मीटर की ऊँचाई पर, बिना तोपख़ाने के सपोर्ट के — दुश्मन की मज़बूत चौकी पर रात के अंधेरे में हमला बोला और उसे तबाह कर दिया। ये ऑपरेशन विजय की पहली बड़ी कामयाबी थी।
वांगचुक लद्दाख के सांकर गाँव में पैदा हुए थे। लद्दाख स्काउट्स में उनकी सेवा किंवदंती बन चुकी है। हाई-ऑल्टीट्यूड वॉरफ़ेयर में उनकी महारत ऐसी थी कि दुश्मन भी सलाम करता था। चोरबत ला की उस रात उन्होंने अपनी छोटी टुकड़ी के साथ फ़्लैंकिंग मूवमेंट किया — बर्फ़ीले तूफ़ान में, बिना किसी एयर सपोर्ट के। नतीजा? दुश्मन की पोज़ीशन ध्वस्त, कई पाकिस्तानी सैनिक ढेर, और भारतीय तिरंगा चोरबत ला पर लहराया। इसी बहादुरी के लिए उन्हें महावीर चक्र — भारत का दूसरा सबसे बड़ा युद्धकालीन वीरता पुरस्कार — दिया गया।
30 साल से ज़्यादा की सेना में सेवा के बाद वांगचुक 2018 में रिटायर हुए थे। लेकिन लद्दाख में वो सिर्फ़ फ़ौजी नहीं, एक प्रतीक थे — साहस का, विनम्रता का, देश के लिए सब कुछ दाँव पर लगा देने की ज़िद का। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा: "उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।" सवाल ये है कि क्या हम उनकी विरासत को सिर्फ़ शब्दों में याद रखेंगे या सच में उन सैनिकों का ख़्याल रखेंगे जो सियाचिन से लेकर चोरबत ला तक — हर रात ज़ीरो से नीचे तापमान में — देश की सरहदों पर खड़े रहते हैं? लद्दाख का शेर चला गया। लेकिन उसकी दहाड़ हमेशा गूँजती रहेगी।