पाकिस्तान एक तरफ़ अमेरिका-ईरान सीज़फ़ायर का "शांतिदूत" बनने का नाटक कर रहा है, और दूसरी तरफ़ उसके रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ अंतरराष्ट्रीय मंच पर ज़हर उगल रहे हैं। आसिफ़ ने इज़रायल को "कैंसर" कहा, "मानवता का अभिशाप" बताया, और "यहूदी शाप हैं" जैसी भाषा इस्तेमाल की — वो भी तब जब पाकिस्तान इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता की मेज़बानी कर रहा है। ये किस तरह की "तटस्थ मध्यस्थता" है?
इज़रायल ने इस पर वो किया जो पहले कभी नहीं किया — पाकिस्तान को सीधे "आतंकी राज्य" घोषित कर दिया। प्रधानमंत्री नेतन्याहू के कार्यालय ने बयान जारी किया: "ये भाषा किसी भी सरकार से बर्दाश्त नहीं की जा सकती, ख़ासकर उससे नहीं जो शांति का तटस्थ मध्यस्थ होने का दावा करती हो।" विदेश मंत्री गिदोन सार ने आसिफ़ की टिप्पणियों को "यहूदी-विरोधी भड़काऊ बयान" कहा और चेतावनी दी कि इज़रायल अपनी रक्षा करता रहेगा। ये इज़रायल-पाकिस्तान के बीच अब तक का सबसे तीखा सार्वजनिक टकराव है।
दोनों देशों के बीच कभी औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं रहे — लेकिन एक अनकहा "इग्नोर करो" का सिद्धांत चलता था। वो अब ख़त्म हो गया। पाकिस्तान ने शांतिदूत बनना चाहा, लेकिन अपने ही रक्षा मंत्री की ज़बान पर क़ाबू नहीं रख पाया। आसिफ़ ने बाद में अपना सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट भी कर दिया — लेकिन तब तक नुक़सान हो चुका था। सवाल ये है — क्या पाकिस्तान की "मध्यस्थता" की विश्वसनीयता अब ख़त्म हो गई? क्या अमेरिका अब किसी और को बातचीत का ज़रिया बनाएगा? और सबसे बड़ा सवाल — जो देश ख़ुद "आतंकी राज्य" कहलवा रहा है, वो दूसरों को शांति का पाठ कैसे पढ़ाएगा?