उत्तर प्रदेश का नोएडा — जिसे भारत की मैन्युफैक्चरिंग राजधानी कहा जाता है — धुएं और अफरातफरी में डूब गया। फेज 2 और आसपास के औद्योगिक इलाकों में सैकड़ों फैक्ट्री मजदूर सड़कों पर उतर आए। मांग साफ थी — तनख्वाह बढ़ाओ। लेकिन जो प्रदर्शन शांतिपूर्ण शुरू हुआ था, वह जल्दी ही हिंसा में बदल गया। गाड़ियां फूंकी गईं, संपत्ति तोड़ी गई, पत्थरबाजी हुई और पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। कम से कम 50 मजदूरों को गिरफ्तार किया गया है। इलाके में भारी पुलिस बल तैनात है और ट्रैफिक पूरी तरह ठप हो गया है। यह सिर्फ एक दिन की हिंसा नहीं है — यह भारत के औद्योगिक मजदूरों के सालों के दबे हुए गुस्से का विस्फोट है।
इस विस्फोट के पीछे की कहानी समझिए। नोएडा के फैक्ट्री मजदूरों को करीब 13,000 से 15,000 रुपये महीना मिलता है — एक ऐसी रकम जो बढ़ती महंगाई में बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाती। मजदूर कम से कम 20,000 रुपये मासिक वेतन की मांग कर रहे हैं। लेकिन बात सिर्फ तनख्वाह की नहीं है। मजदूरों की छह बड़ी मांगें हैं — बोनस, साप्ताहिक छुट्टी, ओवरटाइम का भुगतान, समय पर सैलरी, यौन उत्पीड़न रोकथाम समिति का गठन और शिकायत सेल। सबसे तीखी बात यह है कि पड़ोसी राज्य हरियाणा में न्यूनतम वेतन करीब 19,000 रुपये है — नोएडा से लगभग 35 प्रतिशत ज्यादा। इसी असमानता ने मजदूरों के गुस्से में आग लगा दी। इसी तरह के प्रदर्शन हरियाणा के मानेसर में पहले शुरू हो चुके थे और अब नोएडा तक फैल गए हैं।
विडंबना यह है कि हिंसा से एक दिन पहले ही नोएडा के जिला मजिस्ट्रेट ने औद्योगिक शांति बनाए रखने के लिए एक बैठक बुलाई थी। उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव और श्रम आयुक्त भी वर्चुअली जुड़े थे। बैठक में मजदूरों के हितों की सुरक्षा, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान, बोनस और कार्यस्थल सुरक्षा पर चर्चा हुई। लेकिन अगले ही दिन सड़कों पर जो दिखा, उससे साफ है कि बैठकों की भाषा और जमीनी हकीकत में कितना फर्क है। 300 से ज्यादा फैक्ट्रियों के हजारों मजदूरों का एक साथ सड़कों पर आना बताता है कि यह कोई अचानक भड़काव नहीं था — यह एक व्यवस्थित असंतोष है जिसे बहुत लंबे समय से नजरअंदाज किया गया। जब तक सरकार और उद्योग जगत मिलकर वेतन असमानता और मजदूरों के बुनियादी अधिकारों पर ठोस कदम नहीं उठाते, ऐसी हिंसा बार-बार दोहराई जाएगी।