जब दुनिया इस्लामाबाद में शांति की उम्मीद लगाए बैठी है, तब पर्दे के पीछे एक और खेल चल रहा है। अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने बड़ा ख़ुलासा किया है कि चीन ईरान को नई एयर डिफ़ेंस सिस्टम भेजने की तैयारी कर रहा है। ये ख़बर ऐसे वक़्त पर आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच नाज़ुक सीज़फ़ायर चल रहा है। अगर ये आरोप सच हैं, तो चीन सीधे तौर पर शांति प्रक्रिया में बम लगा रहा है। बीजिंग में चीनी दूतावास ने इन रिपोर्ट्स को सिरे से नकार दिया है, लेकिन अमेरिकी इंटेलिजेंस सूत्रों को इन दावों पर पूरा भरोसा है। सवाल ये है — चीन आख़िर क्यों चाहता है कि मध्य पूर्व में अस्थिरता बनी रहे?
इसका जवाब भू-राजनीति में छुपा है। चीन के लिए ईरान सिर्फ़ एक सहयोगी नहीं, बल्कि अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने का एक मोहरा है। एयर डिफ़ेंस सिस्टम का मतलब है कि ईरान को आसमान से होने वाले किसी भी हमले के ख़िलाफ़ और मज़बूत किया जा रहा है — चाहे वो इज़रायल की तरफ़ से हो या अमेरिका की तरफ़ से। ये वही रणनीति है जो रूस ने सीरिया में अपनाई थी — S-300 और S-400 सिस्टम देकर असद सरकार को बचाया था। अब चीन वही खेल मध्य पूर्व में खेल रहा है। अमेरिका के लिए ये सिर्फ़ हथियारों की ख़ेप नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चुनौती है जो इस्लामाबाद वार्ता की पूरी बुनियाद हिला सकती है।
अगर चीन सच में ये हथियार भेजता है, तो ट्रम्प प्रशासन के लिए ये एक बड़ा सिरदर्द बन सकता है। एक तरफ़ पाकिस्तान में शांति वार्ता, दूसरी तरफ़ चीन ईरान को और ताक़तवर बना रहा है। ये वही दोहरा खेल है जो शीत युद्ध के दौरान महाशक्तियाँ खेलती थीं — एक हाथ में ज़ैतून की शाख़, दूसरे में तलवार। कुशनर और वैंस की टीम को अब सिर्फ़ ईरान से नहीं, बल्कि चीन के साये से भी निपटना होगा। क्या अमेरिका बीजिंग पर दबाव बना पाएगा? या ये शांति वार्ता सिर्फ़ एक और अधूरी कोशिश बनकर रह जाएगी?