दुनिया की नज़रें इस्लामाबाद पर टिकी हैं। पाकिस्तान ने वो कर दिखाया जो कई बड़े देश नहीं कर पाए — अमेरिका और ईरान को एक ही टेबल पर बिठा दिया। त्रिपक्षीय वार्ता में पाकिस्तानी अधिकारी मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं, और ये कोई छोटी बात नहीं। सालों से अमेरिका और ईरान के बीच बात बिचौलियों के ज़रिए होती थी — कभी ओमान, कभी क़तर। लेकिन अब पहली बार आमने-सामने बैठकर बात हो रही है, और वो भी पाकिस्तान की ज़मीन पर। इस्लामाबाद ने ख़ुद को एक ऐसे कूटनीतिक खिलाड़ी के तौर पर स्थापित कर दिया है जिसे अब कोई नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। चीन और रूस जहाँ ईरान का साथ देते रहे, वहीं पाकिस्तान ने दोनों पक्षों का भरोसा जीतकर मध्यस्थ की कुर्सी हासिल की।
उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस अमेरिकी दल का नेतृत्व कर रहे हैं, साथ में विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़ और राष्ट्रपति ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर भी हैं। ईरान का प्रतिनिधिमंडल 71 लोगों का है — वार्ताकार, विशेषज्ञ, मीडिया और सुरक्षा अधिकारी शामिल हैं। दोनों तरफ़ से बड़ी टीमें आई हैं, जो बताता है कि ये बातचीत सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं है। अमेरिका ने भी "विषय विशेषज्ञों का पूरा सेट" लाया है, जबकि वॉशिंगटन से अतिरिक्त विशेषज्ञ दूर से सहायता दे रहे हैं। सवाल ये है कि क्या ये बातचीत सिर्फ़ तस्वीरें खिंचवाने तक सीमित रहेगी या असल नतीजे निकलेंगे?
पाकिस्तान के लिए ये पल ऐतिहासिक है। एक ऐसा देश जिसे अक्सर आतंकवाद और अस्थिरता के संदर्भ में देखा जाता था, आज दुनिया की सबसे नाज़ुक शांति प्रक्रिया का मेज़बान है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की सरकार ने ये कूटनीतिक जीत हासिल करके साबित किया है कि पाकिस्तान सिर्फ़ संकट का नाम नहीं, बल्कि समाधान का हिस्सा भी हो सकता है। अगर ये वार्ता सफल होती है, तो मध्य पूर्व में शांति का श्रेय काफ़ी हद तक इस्लामाबाद को जाएगा। और अगर नाकाम होती है? तो भी पाकिस्तान ने ये साबित कर दिया कि वो बड़े मंच पर खड़ा होने की हिम्मत रखता है।