इस्लामाबाद में जब अमेरिका और ईरान शांति की बात कर रहे हैं, तब इज़रायल लेबनान में आग बरसा रहा है। हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर इज़रायली हमले शनिवार को भी जारी रहे — ये महीनों में ईरान समर्थित इस संगठन के ख़िलाफ़ सबसे भीषण सैन्य अभियान है। दुनिया के लिए ये तस्वीर बेहद विरोधाभासी है — एक तरफ़ कूटनीति की मेज़, दूसरी तरफ़ बमों की बारिश। ईरान के लिए हिज़्बुल्लाह सिर्फ़ एक संगठन नहीं, बल्कि उसकी क्षेत्रीय ताक़त का स्तंभ है। इज़रायल का हर हमला तेहरान के लिए एक व्यक्तिगत अपमान है।
इज़रायली और लेबनानी राजनयिक अगले हफ़्ते मिलने की योजना बना रहे हैं, लेकिन लेबनान के प्रधानमंत्री ने अपनी वॉशिंगटन यात्रा स्थगित कर दी है ताकि वो बेरूत से संकट का प्रबंधन कर सकें। ये फ़ैसला बताता है कि स्थिति कितनी गंभीर है। जब एक देश का प्रधानमंत्री अमेरिकी राजधानी जाने की बजाय अपनी राजधानी में रुकता है, तो समझिए कि ज़मीन पर हालात बेक़ाबू हैं। इज़रायल की रणनीति स्पष्ट है — हिज़्बुल्लाह को इतना कमज़ोर करो कि ईरान बातचीत की मेज़ पर मजबूर हो।
लेकिन ये रणनीति उल्टी भी पड़ सकती है। ईरान के लिए हिज़्बुल्लाह पर हमला एक लाल रेखा है। अगर तेहरान को लगा कि शांति वार्ता सिर्फ़ एक दिखावा है जबकि इज़रायल उसके सबसे क़रीबी सहयोगी को तबाह कर रहा है, तो ईरान बातचीत की मेज़ से उठ सकता है। और अगर ऐसा हुआ, तो होर्मुज़ जलडमरूमध्य फिर से बंद हो सकता है, तेल की क़ीमतें आसमान छू सकती हैं, और मध्य पूर्व एक बार फिर अंधेरी सुरंग में धकेल दिया जाएगा। इज़रायल को ये तय करना होगा कि उसे हिज़्बुल्लाह को कमज़ोर करना ज़्यादा ज़रूरी है या मध्य पूर्व में शांति।