इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक सीधी बातचीत जारी है — 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार दोनों देश आमने-सामने बैठे हैं। पाकिस्तान ने इस वार्ता की मेज़बानी कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बड़ी भूमिका का दावा किया है। लेकिन चमकदार कूटनीतिक दिखावे के पीछे एक कहीं ज़्यादा जटिल और स्वार्थी तस्वीर छिपी है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता निःस्वार्थ नहीं है। देश होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान की पकड़ से सबसे ज़्यादा प्रभावित है — पाकिस्तान अपने तेल और गैस का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है और युद्ध के कारण ऊर्जा की क़ीमतें आसमान छू रही हैं। पहले से कमज़ोर अर्थव्यवस्था, गिरती आय और बेतहाशा महंगाई से जूझ रहा पाकिस्तान इस संकट को और बर्दाश्त नहीं कर सकता। यही वजह है कि इस्लामाबाद ने बातचीत के लिए इतनी तेज़ी दिखाई।
इसके अलावा पाकिस्तान ने पिछले साल सऊदी अरब के साथ आपसी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। अगर यह युद्ध और बढ़ता, तो पाकिस्तान को सऊदी अरब की रक्षा में अपने पड़ोसी ईरान के ख़िलाफ़ खड़ा होना पड़ सकता था — एक ऐसी दुविधा जिससे इस्लामाबाद हर क़ीमत पर बचना चाहता है। शांति वार्ता की मेज़बानी इस जोखिम को टालने का सबसे आसान रास्ता है।
टाइम पत्रिका ने इसे सही पकड़ा — पाकिस्तान "शांतिदूत" के रूप में अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि बदलने की कोशिश कर रहा है। एक ऐसा देश जिसे दशकों से आतंकवाद के आरोपों, अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान समर्थन और कश्मीर विवाद के कारण कूटनीतिक अलगाव झेलना पड़ा है, वह अब अचानक "विश्व मध्यस्थ" बनने की होड़ में है। लेकिन विडंबना देखिए — यही पाकिस्तान कुछ दिन पहले इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू को "आतंकवादी" घोषित कर रहा था और इज़रायल को "कैंसर" बता रहा था, जो किसी तटस्थ मध्यस्थ का व्यवहार नहीं है।
अब बात करते हैं नतीजों की। पाकिस्तानी सूत्रों का दावा है कि बातचीत का "माहौल सकारात्मक" है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और कहती है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य के नियंत्रण पर गतिरोध बरक़रार है — ईरान इसे अपना संप्रभु अधिकार मानता है जबकि अमेरिका इसे खुला रखना चाहता है। ईरान ने 6 अरब डॉलर की जमी हुई संपत्तियों की रिहाई, परमाणु कार्यक्रम की गारंटी और जहाज़ों से होर्मुज़ पारगमन शुल्क वसूलने का अधिकार माँगा है — ऐसी माँगें जिन्हें तेहरान के वार्ता दल के क़रीबी सूत्रों ने भी "अस्वीकार्य" स्थिति बताया है।
इज़रायल की लेबनान पर लगातार बमबारी ने स्थिति और जटिल बना दी है। ईरान चाहता है कि सीज़फ़ायर में लेबनान भी शामिल हो, जबकि अमेरिका इसे अलग रखना चाहता है। मध्य पूर्व भर में इन वार्ताओं से उम्मीदें बेहद कम हैं। पाकिस्तान ने ख़ुद अपना लक्ष्य बेहद मामूली रखा है — बस इतना कि बातचीत का सिलसिला जारी रहे। यह कोई सफलता नहीं, बल्कि विफलता को टालने की कोशिश है। इस्लामाबाद ने एक बड़ा मंच तो सजाया, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह मंच शांति लाएगा या सिर्फ़ पाकिस्तान की छवि चमकाने का ज़रिया बनकर रह जाएगा।