भारतीय राजनीति में कुछ लड़ाइयाँ मंच पर दिखती हैं, लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे होता है। लोकसभा विस्तार और महिला आरक्षण को लेकर जो सियासी तूफ़ान उठा है, उसकी सतह पर तो बात "महिला सशक्तिकरण" की हो रही है — लेकिन गहराई में असली टकराव परिसीमन को लेकर है। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस सच्चाई को बेलाग शब्दों में सामने रख दिया है। उन्होंने लिखा कि महिला आरक्षण से किसी को कोई ऐतराज़ नहीं है — यह मुद्दा पहले ही तय हो चुका है। असली ख़तरा वह परिसीमन प्रक्रिया है जो सरकार इसके साथ बंडल करके ला रही है। सोनिया ने इसे "संविधान पर हमला" करार दिया है — और यह कोई ख़ाली बयानबाज़ी नहीं है।
समझिए कि परिसीमन इतना विवादास्पद क्यों है। सरकार लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करना चाहती है — यानी 50% की बढ़ोतरी। इसके लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाया जाएगा, न कि उस नई जनगणना को जो अभी शुरू हुई है। सवाल यह है कि जनगणना के पुराने आँकड़ों के आधार पर सीटें बाँटी गईं तो जिन राज्यों ने परिवार नियोजन में अग्रणी भूमिका निभाई — जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक — उन्हें नुक़सान होगा। जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को ज़्यादा सीटें मिलेंगी। यह दक्षिण बनाम उत्तर का एक नया राजनीतिक विभाजन पैदा कर सकता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने तो साफ़ कह दिया है कि महिला आरक्षण दे दो, लेकिन सीटों की संख्या और नक़्शों से छेड़छाड़ मत करो।
प्रधानमंत्री मोदी इसे एक ऐतिहासिक अवसर बता रहे हैं और कह रहे हैं कि 2023 में जब सर्वसम्मति से महिला आरक्षण विधेयक पारित हुआ था, तब सभी दलों ने माँग की थी कि इसे 2029 तक लागू किया जाए। लेकिन विपक्ष का कहना है कि सरकार ने सर्वदलीय बैठक की माँग ठुकरा दी और बिना किसी विचार-विमर्श के विशेष सत्र बुला लिया। राहुल गांधी ने "जल्दबाज़ी में किए गए परिसीमन की विषमताओं" पर चिंता जताई है। कांग्रेस चाहती है कि पहले सार्वजनिक बहस हो, सभी दलों से बात हो, और फिर मानसून सत्र में संशोधन विधेयक लाया जाए। यह टकराव सिर्फ़ महिला आरक्षण का नहीं है — यह भारत के संघीय ढाँचे और राज्यों के प्रतिनिधित्व की लड़ाई है। अगर परिसीमन ग़लत तरीक़े से हुआ, तो दक्षिण भारत की आवाज़ संसद में और कमज़ोर हो जाएगी — और यही सोनिया गांधी की असली चिंता है।