अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रविवार को एक ऐसा ऐलान किया जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया — होर्मुज़ जलडमरूमध्य की "तत्काल" नौसैनिक नाकाबंदी। पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान के साथ 21 घंटे से ज़्यादा चली मैराथन शांति वार्ता बिना किसी नतीजे के टूट गई। उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस की अगुवाई में अमेरिकी टीम ने कहा कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश छोड़ने को तैयार नहीं। ट्रम्प ने Truth Social पर लिखा — "अमेरिकी नौसेना, दुनिया की सर्वश्रेष्ठ, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में आने-जाने वाले हर जहाज़ को रोकने की प्रक्रिया तुरंत शुरू करेगी।"
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल गलियारा है — वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% इसी रास्ते से गुज़रता है। ईरान पहले से ही इस जलमार्ग को आंशिक रूप से बंद कर चुका था, लेकिन अमेरिका की पूर्ण नाकाबंदी एक बिल्कुल अलग स्तर की बात है। तेल की क़ीमतें पहले ही $100 प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं और विश्लेषकों का कहना है कि पूर्ण नाकाबंदी से यह $150 तक पहुँच सकती है। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह एक भयावह परिदृश्य है जो महँगाई और आर्थिक मंदी दोनों को बढ़ा सकता है।
ट्रम्प का तर्क है कि ईरान इस जलडमरूमध्य को नियंत्रित करके आर्थिक फ़ायदा उठा रहा है जबकि बाक़ी दुनिया इसकी बंदी से तबाह हो रही है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि अमेरिकी नाकाबंदी से सबसे ज़्यादा नुक़सान ईरान को नहीं बल्कि अमेरिका के अपने सहयोगियों को होगा। खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ तेल निर्यात पर निर्भर हैं और नाकाबंदी उनकी आय को भी ठप कर देगी। सऊदी अरब, UAE और क़तर पहले से ही इस क़दम पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। यह स्थिति एक व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकती है।
दुनिया के लिए इसका मतलब साफ़ है — ऊर्जा संकट, बढ़ती महँगाई और भू-राजनीतिक अस्थिरता का एक नया दौर। यूरोप जो पहले से रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ऊर्जा संकट झेल रहा है, उसके लिए होर्मुज़ की नाकाबंदी दोहरी मार होगी। भारत के लिए तेल की बढ़ती क़ीमतें रुपये पर दबाव और चालू खाता घाटे को बढ़ाएँगी। एशियाई बाज़ारों में पहले ही बिकवाली का दबाव बढ़ रहा है। ट्रम्प ने कहा है कि "दूसरे देश भी इस नाकाबंदी में शामिल होंगे" — लेकिन फ़िलहाल कोई भी बड़ी शक्ति इस ख़तरनाक दाँव में साथ देने को तैयार नहीं दिख रही। यह एक ऐसा जुआ है जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को दाँव पर लगा रहा है।