स्तालिन ने परिसीमन विधेयक जलाया — पर वही विधेयक तमिलनाडु को 39 से 59 लोकसभा सीटें देता है। जिस विधेयक पर काला झंडा फहराया, वही दक्षिण की शक्ति बढ़ाता है। द्रविड़ राजनीति का असली खेल बेनक़ाब।
⚡ आप पर असर
DMK की पारिवारिक राजनीति को बचाने के लिए तमिल जनता को 20 अतिरिक्त लोकसभा सीटों से वंचित किया जा रहा है। द्रविड़ नाटक का असली बिल जनता को चुकाना पड़ेगा।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्तालिन ने काले कपड़े पहने, काला झंडा फहराया, और परिसीमन विधेयक की प्रति जलाई। सोशल मीडिया पर तस्वीरें दौड़ीं, द्रविड़ शक्ति ने नारे लगाए, INDIA गठबंधन ने तालियाँ बजाईं। लेकिन एक छोटी सी सच्चाई किसी ने नहीं बताई — वही विधेयक तमिलनाडु को 39 से बढ़ाकर 59 लोकसभा सीटें देता है।
जी हाँ, 59। अमित शाह ने ख़ुद आँकड़े सदन में रखे — परिसीमन के बाद तमिलनाडु को 20 अतिरिक्त सीटें मिलेंगी, कर्नाटक को 14 और, बंगाल को 8 और। यानी जिस विधेयक को 'दक्षिण विरोधी' कहकर जलाया जा रहा है, वही दक्षिण की राजनीतिक शक्ति को सीधे बढ़ाता है। फिर स्तालिन का असली डर क्या है? डर है DMK की पकड़ का — कि नई सीटें नए चेहरों को मौक़ा देंगी, और उनकी पारिवारिक सत्ता कमज़ोर होगी।
स्तालिन की राजनीति का यह पुराना फ़ॉर्मूला है — 'हिंदी थोपी जा रही है', 'उत्तर बनाम दक्षिण', 'द्रविड़ अस्मिता ख़तरे में।' हर चुनाव से पहले यही नारे, यही नाटक। लेकिन इस बार जब बात साँसदों की संख्या की है, जब बात तमिल जनता को ज़्यादा प्रतिनिधित्व मिलने की है, तब अचानक स्तालिन को 'षड्यंत्र' दिखता है। क्यों? क्योंकि नई सीटें मतलब नए नेता, और नए नेता मतलब करुणानिधि-स्तालिन वंश को चुनौती।
बीजेपी सांसद L मुरुगन ने ठीक कहा — 'जो काले झंडे फहरा रहे हैं वो दरअसल अपनी कुर्सी का काला झंडा फहरा रहे हैं।' DMK वर्षों से 'सोशल जस्टिस' की दुकान चला रहा है, लेकिन जब असली प्रतिनिधित्व बढ़ने का अवसर आया, तो वही दुकान का शटर गिरा दिया। यही है द्रविड़ राजनीति का असली चरित्र — मंच पर नारे, अंदर पारिवारिक सत्ता का गणित।
तमिल जनता समझदार है। वो जलते हुए विधेयक के पीछे जलती हुई राजनीति देख रही है। और जब उन्हें पता चलेगा कि उनके राज्य की 20 अतिरिक्त सीटें केवल इसलिए नहीं मिलीं क्योंकि DMK अपनी पारिवारिक कुर्सी बचाना चाहता था — तब असली ज्वाला और कहीं उठेगी। स्तालिन ने जो काला झंडा फहराया, वो उनकी अपनी राजनीति का काला अध्याय बन सकता है।
एक और बात ध्यान देने लायक़ है — स्तालिन ने यह नाटक उस दिन किया जब अमित शाह ने सबसे पहले तमिलनाडु को 59 सीटें देने का आँकड़ा सार्वजनिक किया। यानी 'जलाने' का काम विधेयक के विरोध में नहीं था, यह आँकड़ों के विरोध में था। DMK नहीं चाहती थी कि तमिल जनता को पता चले कि उन्हें 20 अतिरिक्त सीटें मिलने वाली हैं। क्योंकि अगर पता चल गया, तो स्तालिन का काला झंडा बेअसर हो जाता। यही है द्रविड़ ब्रांड की राजनीति — सच्चाई को धुएँ में छुपाओ, और काले कपड़ों से जनता को डराओ। पर 2026 का तमिल वोटर 1976 का तमिल वोटर नहीं है।