भारतीय संसद के इतिहास में कुछ ही ऐसे क्षण आते हैं जब सत्ता पक्ष विपक्ष को ऐसी स्थिति में धकेल देता है जहाँ विरोध करना भी हार और समर्थन करना भी हार जैसा लगता है। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 ठीक ऐसा ही मौक़ा है। मोदी सरकार ने लोकसभा की सीटें 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव नारी शक्ति वंदन अधिनियम — यानी महिला आरक्षण — के साथ जोड़कर एक ऐसा राजनीतिक शतरंज खेला है जहाँ विपक्ष हर चाल में मात खा रहा है।
आँकड़ों की बात करें तो लोकसभा में विधेयक पास करने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की ज़रूरत है। अगर सभी 540 सदस्य मौजूद हों तो 360 वोट चाहिए। विपक्ष के पास कुल 234 सांसद हैं — कांग्रेस, सपा, तृणमूल और DMK मिलकर 185 सांसदों तक सीमित हैं। यह संख्या विधेयक रोकने के लिए पर्याप्त लग सकती है, लेकिन असली सवाल यह है — क्या विपक्ष महिला आरक्षण का विरोध करने का राजनीतिक बोझ उठा सकता है? यहीं पर मोदी सरकार की रणनीति की प्रतिभा दिखती है।
विपक्ष का तर्क है कि वे "परिसीमन के ख़िलाफ़ हैं, महिला आरक्षण के नहीं।" लेकिन आम जनता के लिए यह अंतर समझना मुश्किल है। टेलीविज़न स्क्रीन पर जो दिखेगा वह यही होगा — विपक्ष ने महिलाओं को उनका हक़ देने वाले विधेयक का विरोध किया। मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जितनी भी बारीकियाँ बताई जाएँ, चुनावी मैदान में यह एक वाक्य में सिमट जाएगा — "विपक्ष महिलाओं के ख़िलाफ़।" यह Pelium की शुद्ध राजनीति है — मोदी सरकार ने एक ऐसा क़दम उठाया है जो करोड़ों महिलाओं को संसद में प्रतिनिधित्व का सपना दिखाता है, और इसका विरोध करने वाला हर दल अपने ही वोट बैंक में सेंध लगा रहा है।
राज्यसभा में NDA की स्थिति और मज़बूत है। 244 सदस्यों में दो-तिहाई बहुमत के लिए 163 वोट चाहिए, NDA के पास 141 हैं। अगर विपक्ष का एक हिस्सा भी अनुपस्थित रहता है या मतदान से दूर रहता है, तो प्रभावी बहुमत की सीमा और कम हो जाएगी। TDP जैसे सहयोगियों की चिंताओं को भी सरकार के पास समय और रणनीति से संभालने की क्षमता है।
सच्चाई यह है कि भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व शर्मनाक रूप से कम रहा है। संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 15% से भी कम है जबकि वे आबादी का आधा हिस्सा हैं। दशकों से हर दल ने महिला आरक्षण का वादा किया लेकिन किसी ने इसे लागू करने की हिम्मत नहीं दिखाई। मोदी सरकार ने न सिर्फ़ नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित करवाया बल्कि अब उसे ज़मीन पर लागू करने का भी रास्ता बना रही है। विपक्ष को अगर परिसीमन से असहमति है तो वे संशोधन प्रस्तावित करें — पूरे विधेयक का विरोध करके वे महिला सशक्तिकरण की ऐतिहासिक लहर के सामने दीवार बन रहे हैं, और यह दीवार जनमत की सुनामी नहीं रोक पाएगी।