यह सिर्फ़ एक चुनाव नहीं था — यह भारत के लोकतंत्र की ताक़त का प्रदर्शन था। तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों पर मतदान 84.41% पर बंद हुआ — राज्य के इतिहास का सबसे ऊंचा आंकड़ा, पिछले चुनाव से ग्यारह प्रतिशत अंक ऊपर। करूर ज़िला अकेले 89% पार कर गया। उधर पश्चिम बंगाल के पहले चरण में 152 सीटों पर लगभग 78.77% वोट पड़े — यह भी एक रिकॉर्ड। चुनाव आयोग ने दोनों आंकड़ों की पुष्टि की है, और दोनों ही अपने-अपने राज्यों में आज़ादी के बाद के सबसे बड़े आंकड़े हैं। छह करोड़ से ज़्यादा लोगों ने एक ही दिन में अपने वोट का अधिकार इस्तेमाल किया।
तमिलनाडु में पहली बार एक पीढ़ी बाद तिकोना मुक़ाबला है। एक तरफ़ एम.के. स्टालिन की डीएमके गठबंधन, दूसरी तरफ़ एडपाडी पलानीस्वामी की अगुआई में एआईएडीएमके-एनडीए, और तीसरा कोण — अभिनेता विजय की टीवीके की ऐतिहासिक शुरुआत। परंपरागत रूप से ऊंचा मतदान सत्तारूढ़ दल के पक्ष में जाता रहा है, लेकिन विजय की रैलियों से निकले युवा वोटर उस गणित को पलट सकते हैं। बंगाल का सवाल अलग है — क्या ममता बनर्जी की टीएमसी ग्रामीण बेल्ट थाम पाई, या बीजेपी ने उन ज़िलों में सेंध लगाई जहां पोलिंग-दिन हिंसा की ख़बरें आईं?
मतगणना 4 मई को है। उसके बीच बाक़ी बंगाल चरणों के दौरान एग्ज़िट पोल पर रोक रहेगी — यानी जो भी आंकड़े मीडिया पर घूम रहे हैं वे सिर्फ़ शोर हैं। लेकिन एक बात शोर नहीं है — जिस भारतीय वोटर को दस साल से कहा जा रहा था कि लोकतंत्र थक गया है, उसी ने देश के इतिहास का सबसे भागीदारी वाला राज्य चुनाव दे दिया। जो जीते सो जीते, यह तथ्य पहले ही हर नतीजे से बड़ा है।