नोएडा में मज़दूरों की हिंसा के बाद जो राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आईं, उनमें एक पैटर्न स्पष्ट दिखता है — भावना बहुत, समाधान शून्य। राहुल गांधी ने X पर एक लंबी पोस्ट लिखी जिसमें उन्होंने कहा कि "नोएडा की सड़क पर जो कल हुआ वो इस देश के श्रमिकों की अंतिम चीख़ थी।" कविता जैसी भाषा, भावुक शब्द, दर्दनाक तस्वीर — लेकिन एक सवाल पूछिए: क्या राहुल गांधी ने कोई ठोस आर्थिक प्रस्ताव रखा? क्या उन्होंने बताया कि अगर वो सत्ता में होते तो न्यूनतम वेतन कितना रखते? कोई संख्या नहीं, कोई नीति नहीं — सिर्फ़ "विकसित भारत का सच" जैसे जुमले।
राहुल गांधी ने दावा किया कि सरकार ने चार श्रम संहिताएँ "बिना परामर्श" लागू कीं और काम के घंटे 12 कर दिए। लेकिन तथ्य यह है कि ये श्रम संहिताएँ संसद में पारित हुईं, त्रिपक्षीय परामर्श के बाद — और राहुल गांधी उस संसद के सदस्य हैं जहाँ ये बिल पास हुए। अगर विरोध इतना गहरा था, तो संसद में क्यों नहीं रोका? यह वही पैटर्न है — समस्या आने पर ट्वीट, लेकिन जब समाधान का मौक़ा हो तो ग़ायब। दूसरी तरफ़ अखिलेश यादव ने बड़े आत्मविश्वास से कहा "2027 में भाजपा हटेगी।" यह वही अखिलेश हैं जिनकी सरकार में यूपी में क़ानून-व्यवस्था का हाल सबको याद है। भविष्यवाणी करना आसान है, शासन करना मुश्किल।
असल मुद्दा यह है कि विपक्ष के पास मज़दूरों के लिए कोई वैकल्पिक आर्थिक मॉडल नहीं है। कांग्रेस शासित राज्यों में न्यूनतम वेतन की स्थिति क्या है? राजस्थान में जब कांग्रेस सत्ता में थी, तो क्या मज़दूरों को ₹20,000 मिलते थे? कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के तहत औद्योगिक मज़दूरों की हालत क्या है? जवाब सबको पता है। जब योगी सरकार 21% वेतन वृद्धि देती है और वेज बोर्ड गठित करती है, तो विपक्ष कहता है "काफ़ी नहीं।" लेकिन जब विपक्ष से पूछो कि तुम्हारा प्लान क्या है — सन्नाटा। मज़दूरों को हमदर्दी नहीं, नीति चाहिए। और नीति बनाने के लिए शासन का अनुभव चाहिए — जो विपक्ष के पास नहीं है।