बिहार की राजनीति में एक युग का अंत हुआ है। नीतीश कुमार — जिन्होंने दस बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिन्होंने बिहार को "बीमारू" राज्य से विकास की पटरी पर लाने का दावा किया — ने राज्यपाल को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है। उनकी जगह भाजपा के सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे। यह इतिहास है — पहली बार भाजपा का अपना मुख्यमंत्री बिहार की कमान सँभालेगा।
नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा विरोधाभासों से भरी रही। उन्होंने कभी भाजपा के साथ गठबंधन किया, कभी विपक्ष के साथ। कभी लालू यादव के ख़िलाफ़ खड़े हुए, कभी उनके साथ बैठे। इस निरंतर पाला बदलने ने उनकी विश्वसनीयता को लगातार कमज़ोर किया। लेकिन भाजपा ने धैर्य रखा, गठबंधन धर्म निभाया, और अंततः बिहार में अपनी ताक़त इस स्तर तक बढ़ाई कि आज सत्ता का हस्तांतरण स्वाभाविक रूप से हुआ — बिना किसी संकट या तोड़-फोड़ के। सम्राट चौधरी, जो उपमुख्यमंत्री के रूप में पहले से प्रशासनिक अनुभव रखते हैं, भाजपा विधायक दल के नेता चुने गए हैं।
यह बदलाव भाजपा की उस रणनीति का फल है जो तात्कालिक सत्ता के लालच में गठबंधन तोड़ने की बजाय दीर्घकालिक संगठनात्मक विस्तार पर केंद्रित रही। जहाँ कांग्रेस अपने सहयोगियों को एक-एक करके खोती गई — महाराष्ट्र में शिवसेना, बिहार में जेडीयू — वहीं भाजपा ने सहयोगियों को साथ रखते हुए अपनी ज़मीन मज़बूत की। नीतीश कुमार ने ख़ुद कहा कि नई सरकार को उनका "पूर्ण सहयोग और मार्गदर्शन" मिलेगा — यह एक सहज सत्ता परिवर्तन है, लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण। बिहार अब भाजपा के प्रत्यक्ष नेतृत्व में विकास के अगले चरण में प्रवेश करेगा — और विपक्ष के पास इसका कोई जवाब नहीं है।