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भारत 100% क़ीमत दे रहा, मिल रहा सिर्फ़ 60%: क्या राफ़ेल पर पुनर्विचार ज़रूरी है?

KYAKHABARHAI डेस्क · 07 Apr 2026, 19:00 · 32 मिनट पहले
फ़्रांस ने राफ़ेल का सोर्स कोड देने से मना कर दिया। UAE ने F5 प्रोजेक्ट छोड़ा, जर्मनी FCAS से नाराज़। सवाल: चीन के ख़िलाफ़ जिस लड़ाकू विमान का दिमाग़ आप बदल नहीं सकते, क्या वो सही विकल्प है?
⚡ आप पर असर
आप पर असर: अगर भारत सोर्स कोड के बिना 114 और राफ़ेल ख़रीदता है, तो चीन सीमा पर संघर्ष के समय इन विमानों की EW क्षमता सीमित हो सकती है। करदाताओं के लाखों करोड़ रुपये दांव पर हैं।
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फ़्रांस ने साफ़ कर दिया है कि भारत को राफ़ेल लड़ाकू विमान का सोर्स कोड नहीं मिलेगा — न Thales RBE2 AESA रडार का, न MDPU (विमान का ऑपरेशनल "दिमाग़") का, और न ही SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वॉरफ़ेयर सूट का। IAF के अनुभवी स्क्वाड्रन लीडर विजयिंदर के. ठाकुर (सेवानिवृत्त) के अनुसार, आधुनिक लड़ाकू विमान की कुल लागत का 30-40% सॉफ़्टवेयर में होता है — यानी भारत 100% क़ीमत चुका कर सिर्फ़ 60% विमान पा रहा है। बिना सोर्स कोड के भारत न तो स्वतंत्र रूप से ख़तरा पुस्तिका (threat library) अपडेट कर सकता है, न अपने स्वदेशी हथियार जोड़ सकता है, और न ही चीनी ख़तरों के लिए एल्गोरिदम बदल सकता है। और यह सिर्फ़ भारत की समस्या नहीं — UAE ने €3.5 अरब का Rafale F5 प्रोजेक्ट छोड़ दिया क्योंकि फ़्रांस ने ऑप्ट्रॉनिक्स तकनीक साझा करने से मना कर दिया, और FCAS प्रोग्राम में जर्मनी-फ़्रांस के बीच तनातनी "घातक गोताखोरी" में पहुँच चुकी है।

लेकिन इससे भी गहरा सवाल तकनीकी भेद्यता (vulnerability) का है। राफ़ेल का SPECTRA सूट Digital Radio Frequency Memory (DRFM) जैमिंग पर आधारित है और RBE2 रडार X-बैंड (8-12 GHz) में काम करता है। चीन ने पिछले तीन दशकों में रूसी Su-27/Su-30 प्लेटफ़ॉर्म को पूरी तरह रिवर्स-इंजीनियर कर J-11B और J-16 बनाए हैं। चीन के पास रूसी Khibiny EW सिस्टम और X-बैंड रडार आर्किटेक्चर की गहरी समझ है। फ़्रांसीसी और रूसी EW सिस्टम यद्यपि स्वतंत्र रूप से विकसित हुए, दोनों समान सिग्नल प्रोसेसिंग सिद्धांतों पर काम करते हैं — DRFM काउंटरमेज़र्स, X-बैंड वेवफ़ॉर्म जनरेशन, और फ़्रीक्वेंसी-हॉपिंग प्रोटोकॉल। चीन का KLJ-7A AESA रडार भी X-बैंड में काम करता है। अगर चीन ने रूसी तकनीक से इन सिद्धांतों को डिकोड कर लिया है, तो राफ़ेल की SPECTRA — जो समान भौतिकी पर आधारित है — चीनी काउंटर-काउंटरमेज़र्स के सामने कमज़ोर हो सकती है।

इसके मुक़ाबले, अमेरिकी विकल्प — F-35 का AN/APG-81 और F/A-18E/F Block III का AN/APG-79 — पूरी तरह अलग सॉफ़्टवेयर आर्किटेक्चर पर बने हैं जिनका रूसी-चीनी तकनीकी वंशवृक्ष से शून्य ओवरलैप है। अमेरिकी AESA रडार अलग वेवफ़ॉर्म जनरेशन एल्गोरिदम और Low Probability of Intercept (LPI) मोड इस्तेमाल करते हैं। भारत को ख़ुद से पूछना होगा: जिस लड़ाकू विमान का इलेक्ट्रॉनिक दिमाग़ आप बदल नहीं सकते, जिसकी तकनीकी वंशावली का एक हिस्सा आपके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी ने शायद डिकोड कर लिया हो — क्या 114 और ऐसे विमानों पर अरबों ख़र्च करना रणनीतिक बुद्धिमानी है? यह फ़्रांस-विरोधी बात नहीं, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का गणित है।

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