सोमवार को दिल्ली-NCR के लोग बेमौसम बारिश, गरज और तेज हवाओं के साथ जागे। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 7 और 8 अप्रैल के लिए येलो अलर्ट जारी किया है, जिसमें 30-40 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलने और बिजली गिरने की चेतावनी दी गई है। इंडिगो एयरलाइन ने भी यात्रियों के लिए एडवाइजरी जारी की है।
लेकिन यह सिर्फ एक दिन की बारिश की कहानी नहीं है। यह उस भयावह जलवायु संकट का एक और संकेत है जो अब दुनिया के हर शहर, हर देश और हर महाद्वीप को प्रभावित कर रहा है।
बदलते मौसम का भयावह सच
भारत में मौसम के पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। मार्च 2026 में कई राज्यों में अप्रत्याशित बारिश और ओलावृष्टि हुई — महाराष्ट्र में 1,400 हेक्टेयर से ज्यादा फसल बर्बाद हुई, गुजरात और राजस्थान में ओलावृष्टि ने कटाई को बाधित किया। 2015 से 2024 के बीच भारत का औसत तापमान 20वीं सदी की शुरुआत की तुलना में 0.9°C बढ़ चुका है। भारत के 75% से ज्यादा जिले — जहां 63.8 करोड़ लोग रहते हैं — अब चरम जलवायु घटनाओं के हॉटस्पॉट हैं।
कार्बन उत्सर्जन: रिकॉर्ड ऊंचाई पर
वैश्विक स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक है। 2025 में जीवाश्म ईंधन से कार्बन उत्सर्जन 38.1 अरब टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। वायुमंडल में CO₂ की सांद्रता 430 ppm को पार कर गई — पूर्व-औद्योगिक स्तर से 52% अधिक। IMF के अनुसार, पिछले दशक में जलवायु आपदाओं से सीधा नुकसान 1.3 ट्रिलियन डॉलर रहा है। 1.5°C तक तापमान वृद्धि सीमित रखने का कार्बन बजट "लगभग समाप्त" हो चुका है।
मोदी सरकार के सक्रिय प्रयास
इस संकट से निपटने में मोदी सरकार ने उल्लेखनीय कदम उठाए हैं। भारत ने अपने स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य — कुल बिजली क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म ईंधन से — को 2030 की समयसीमा से पांच साल पहले ही हासिल करते हुए फरवरी 2026 तक 52.57% क्षमता प्राप्त कर ली। 2026 के बजट में नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय का आवंटन 24% बढ़ाकर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचाया गया। कार्बन कैप्चर तकनीक के लिए 2.2 अरब डॉलर का निवेश, भारत का अपना कार्बन बाजार मध्य-2026 तक स्थापित होना, और पीएम सूर्य घर जैसी योजनाओं से रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन दोगुने हुए हैं।
लेकिन बिना वैश्विक सहयोग के क्या?
सबसे बड़ा सवाल यह है — क्या भारत अकेले यह लड़ाई जीत सकता है? जनवरी 2026 में अमेरिका ने पेरिस जलवायु समझौते से औपचारिक रूप से बाहर हो गया। राष्ट्रपति ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन को "धोखाधड़ी" और "चीनी षड्यंत्र" बताया है। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रदूषक अब ईरान, लीबिया और यमन के साथ उन गिने-चुने देशों में शामिल है जो इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं।
जलवायु संकट किसी एक देश की सीमाओं में नहीं रुकता। यह हर इंसान की जिंदगी, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। भारत जैसे देश भले ही अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हों, लेकिन जब तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इसे गंभीरता से नहीं लेंगी, यह संकट हर साल और गहरा होता जाएगा।