बांग्लादेश के विदेश मंत्री डॉ. खलीलुर रहमान 7 से 9 अप्रैल 2026 तक भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। ताजिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार के सत्ता में आने के बाद यह पहली उच्च-स्तरीय बैठक है, और इसका महत्व केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है — यह दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ एक रणनीतिक कदम है। मोदी सरकार ने शुरू से ही "पड़ोसी पहले" नीति को अपनी विदेश नीति का आधार बनाया है, और बांग्लादेश इस नीति का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। भारत-बांग्लादेश के बीच 4,096 किलोमीटर की सीमा, साझा नदियाँ, सांस्कृतिक जुड़ाव और आर्थिक निर्भरता — ये सब इस रिश्ते को अपरिहार्य बनाते हैं। मोदी प्रशासन ने पिछले दशक में बांग्लादेश को बिजली निर्यात, सीमा विवाद समाधान, पारगमन सुविधाएँ और विकास सहायता के माध्यम से यह दिखाया है कि भारत का पड़ोसी होना किसी कर्ज़ की शर्त नहीं, बल्कि साझेदारी का वादा है।
इस यात्रा को चीन की "कर्ज़ जाल कूटनीति" की पृष्ठभूमि में देखना ज़रूरी है, जिसने दुनिया भर में देशों को तबाह किया है। श्रीलंका इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है — 1.4 अरब डॉलर के चीनी कर्ज़ में डूबकर हंबनटोटा बंदरगाह 99 साल की लीज़ पर चीन को सौंपना पड़ा, और देश 2022 में दिवालिया हो गया। पाकिस्तान CPEC के 62 अरब डॉलर के बोझ तले कराह रहा है — सालाना 3.5 से 4 अरब डॉलर की किस्तें चुकानी पड़ रही हैं और IMF की शरण लेनी पड़ी। लाओस ने चीन-लाओस रेलवे के लिए अपनी GDP का लगभग आधा कर्ज़ लिया और अब रेलवे का नियंत्रण और आसपास की ज़मीन चीन को सौंपनी पड़ी। ज़ाम्बिया अफ्रीका का पहला देश बना जिसने चीनी कर्ज़ के कारण डिफॉल्ट किया। जिबूती में चीन का पहला विदेशी सैन्य अड्डा है और उसका कर्ज़ GDP का 70% से अधिक है। मालदीव, टोंगा, कंबोडिया — हर जगह एक ही कहानी: भव्य परियोजनाएँ, अपारदर्शी कर्ज़, घाटे में चलने वाली संरचनाएँ, और अंत में संप्रभुता का नुकसान।
इसी पृष्ठभूमि में मोदी सरकार का बांग्लादेश के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट और व्यावहारिक है। इस यात्रा में तीस्ता जल बँटवारा, सीमा प्रबंधन, ऊर्जा सहयोग, वीज़ा सेवाओं का विस्तार और संयुक्त राष्ट्र महासभा अध्यक्ष पद के लिए बांग्लादेश की उम्मीदवारी जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। भारत का संदेश साफ़ है — हम कर्ज़ नहीं, साझेदारी देते हैं; शर्तें नहीं, सम्मान देते हैं। जहाँ चीन का हर "निवेश" एक जाल बनकर देशों की संप्रभुता छीनता है, वहाँ भारत पड़ोसियों को सशक्त बनाने में विश्वास रखता है। शेख हसीना के प्रत्यर्पण जैसे संवेदनशील मुद्दे कूटनीतिक चुनौती हैं, लेकिन मोदी प्रशासन ने बार-बार दिखाया है कि वह संवाद, धैर्य और रणनीतिक परिपक्वता से जटिल मसलों को सुलझा सकता है। यह यात्रा केवल दो देशों की बैठक नहीं — यह दक्षिण एशिया को चीन की कर्ज़ कूटनीति से बचाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।